लखनऊ में कड़ाके की ठंड में मुख्यमंत्री आवास के गेट पर एक दुबला-पतला आदमी, साधारण कुरता-पायजामा पहने, पैरों में पुरानी हवाई चप्पल डाले पहुंचा।
सुरक्षाकर्मियों ने रोका, नाम पूछा।
“मुलायम से मिलने आया हूँ… पुराना दोस्त हूँ... विश्राम सिंह नाम है।”
सुरक्षाकर्मियों ने ऊपर से नीचे तक देखा चप्पल, साधारण कपड़े, झिझकता चेहरा। अंदर सूचना भेजी गई।
कुछ ही पलों बाद अचानक भीतर हलचल हुई। स्टाफ़ भागता हुआ निकला। मुख्य दरवाज़ा खुला और खुद नेताजी तेज़ क़दमों से बाहर आते दिखाई दिए।
जैसे ही उनकी नज़र विश्राम सिंह पर पड़ी…
“अरे विश्राम… तुम?”
नेताजी ने जैसे ही उनके पैरों पर नजर डाली, वे ठिठक गए।
“विश्राम… इतनी ठंड में तुम हवाई चप्पल पहनकर आए हो?”
विश्राम मुस्कराए, ठिठुरती आवाज़ में बोले,
“सोचा तुमसे मिल आऊँ… बहुत दिन हो गए थे।”
और फिर दोस्त का हाथ थाम लिया वही हाथ, जिसके साथ कभी कॉलेज की सीढ़ियाँ चढ़ी थीं, करहल की गलियों में नौकरी की थी, और जवानी में समाजवाद की बातें की थीं।
“अंदर चलो…”
पुरानी बातें चलने लगीं कॉलेज के दिन, आंदोलन, संघर्ष, करहल की नौकरी, इटावा की गलियाँ। हँसी भी हुई, आँखें भी नम हुईं।
फिर विश्राम सिंह उठे, हाथ जोड़कर बोले,
“चलता हूं… बस तुम्हें देखना था।”
नेताजी ने कहा,
“ठीक है… फिर मिलेंगे।”
विश्राम लौट आए
शाम ढल रही थी। इटावा की ओर जाने वाली बस धूल उड़ाती हुई गाँव के बाहर रुकी। विश्राम नीचे उतरे।
घर पहुँचे तो अजीब-सा माहौल था।
खाकी वर्दी वाले सिपाही, सफ़ेद कमीज़ में अफ़सर, हाथ में फाइलें। पड़ोसी छतों से झाँक रहे थे। बच्चों की फुसफुसाहट गली में तैर रही थी।
विश्राम ठिठक गए।
तभी एक अफ़सर आगे बढ़ा।
“आप ही विश्राम सिंह जी हैं?”
“हाँ… मैं ही हूँ।”
अफ़सर ने मुस्कराकर कहा,
“लखनऊ से आदेश आया है।”
“आपको दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री बनाया गया है।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
विश्राम कुर्सी पर बैठ गए। हाथ काँप रहे थे।
उन्होंने सिर झुका लिया बस इतनी आवाज निकली
“मुलायम…”
देश की राजनीति में ऐसे नेता बहुत कम हुए हैं, जिनसे आम लोग खुद को सहज जोड़ पाते हों। जिनके जाने के बाद लोग उनके किए एहसानों को याद कर भावुक हो उठें। ऐसे ही नेताओं में परम श्रद्धेय नेताजी मुलायम सिंह यादव का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है।
वे सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुँचे नेता नहीं थे, बल्कि उन लोगों को आगे बढ़ाने वाले व्यक्ति थे जिनके पास चुनाव लड़ने की हैसियत तक नहीं होती थी। विधायक, सांसद, मंत्री, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष ऐसे न जाने कितने नाम हैं जिनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत नेताजी के भरोसे से हुई। उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई जिला हो, जहां उनसे जुड़ी कोई कहानी न मिलती हो।
विश्राम सिंह बताते हैं कि उन्होंने और नेताजी ने साथ पढ़ाई की थी। जब वे स्नातक कर रहे थे, उसी समय नेताजी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय होने लगे थे। बाद में दोनों ने करहल में साथ नौकरी भी की। राजनीति में उतरने के बाद नेताजी लगातार आगे बढ़ते गए, लेकिन पुराने साथियों से रिश्ता कभी टूटा नहीं।
#MulayamSinghYadav
#Netaji
#IndianPolitics
#UPPolitics
#PoliticalHistory
#GrassrootsLeader
#LeaderFromTheSoil
#PeopleFirst
#PublicService
#MassLeader
#PoliticalLegacy
#IndianLeaders
#HistoryMatters
#StoryFromTheGround

